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Saturday, August 4, 2007

ऑफलाइनजीवी होने के टॉप #10 फ़ायदे

ऑफलाइनजीवी होने के टॉप #10 फ़ायदे

पिछले दिनों मुझे श्रीशजी ने गूगल पर ऑनलाइन पकड़ लिया, और आश्चर्य चकित होते हुए कहा – कि वे मुझे पहली मर्तबा ऑनलाइन देख रहे हैं. उस दिन मेरे पास दूसरा कोई विकल्प नहीं था – मैं अपने प्रीपेड मोबाइल फोन के जरिए रिलायंस आरकनेक्ट पर था और प्रतिमिनट कोई डेढ़ रुपए जेब से जा रहे थे. मैं पहले ही कोई घंटाभर विचर चुका था अतः मैंने श्रीश से माफ़ी मांगते हुए कट लिया था.
आमतौर पर मैं ऑफलाइन काम करता हूँ. यह आदत तब से बनी हुई है जब इंटरनेट बेहद महंगा होता था. प्रतिमिनट इंटरनेट यूसेज चार्ज के साथ साथ टेलिफोन पल्स चार्ज का भी भुगतान करना होता था. तब दिन भर के सारे काम को एकत्र कर, सहेज कर, ई-मेल क्लाइंट पर ई-पत्रों के जवाब या फिर नए ई-पत्र लिख कर सहेज लेता था और फिर उन्हें दूसरे दिन सुबह पंद्रह मिनट या फिर बहुत हुआ तो आधा घंटा इंटरनेट पर कनेक्ट होकर सारा काम निपटा दिया करता था. सारे ईमेल, यहाँ तक कि याहू! के भी ईमेल याहू पॉप के जरिए ईमेल क्लाएंट जैसे आउटलुक पर डाउनलोड कर लेता था और फिर उनके जवाब लिख कर अगले दिन जब इंटरनेट पर कनेक्ट होता था तब भेजता था.
आमतौर पर कुछ मामलों में यह आदत अब भी बनी हुई है. हालाकि अब मिनट के हिसाब से पैसा नहीं देना पड़ता. गूगल, याहू इत्यादि के ईमेल अभी भी मैं ईमेल क्लाएंट – थंडरबर्ड के जरिए पढ़ता व भेजता हूं. यही हाल नारद या चिट्ठाजगत से चिट्ठों के पढ़ने का है – मैं इन्हें ऑपेरा ब्राउजर के अंतर्निर्मित आरएसएस रीडर में पढ़ना पसंद करता हूं.
ऑफ़लाइन रहने के अपने फ़ायदे हैं. आइए इनमें से खास #10 पर त्वरित नजर डालते हैं –
#1 आपकी ऑनलाइन स्थिति आपके इंटरनेटी दोस्तों को दिखती है तो वे आपसे बात करने को कुलबुलाते हैं. भले ही आप अत्यंत व्यस्त वाली स्थिति को सेट कर रखे होते हैं, सामने वाला अत्यंत जरूरी संदेश आपको भेज ही देता है और आप उस अत्यंत जरूरी संदेश को - भले ही वो एक सड़ा हुआ, पहले भी दसियों मर्तबा सुना हुआ चुटकुला होगा – पढ़ने व पढ़कर उसका प्रत्युत्तर ‘बढ़िया है – हा हा हा...’ लिखकर देने को अभिशप्त होते हैं. और, कभी निन्दारस जैसा कुछ आख्यान चल निकलता है तो फिर आप चैट पर उसी में रम जाते हैं और आपकी चिट्ठा पोस्ट की या बाजार से सब्जी लाने की उस दिन की प्लानिंग धरी रह जाती है.
#2 ऑनलाइन बने रहने में सबसे बड़ी समस्या यह होती है कि आपके विचार को सामने वाले तक पहुँचने में एक सेकण्ड से भी कम समय लगता है. पिछले दिनों हिन्दी चिट्ठा संसार में जो विवाद हुए, उसका मूल जड़ भी संभवतः यही है. यदि आप मेरी तरह ऑफ़लाइनजीवी होते तो कोई भी उकसाऊ भड़काऊ प्रविष्टि पढ़ते, उसका उतना ही उकसाऊ भड़काऊ त्वरित जवाब सोचते, और लिख भी मारते, परंतु अगले दिन भेजते भेजते आपके विचार ठंडे पड़ जाते और आप खुद शर्मसार होकर सोचते, अरे मैं ये क्या कह रहा था. और आपकी उंगलियाँ उस ईमेल संदेश या चिट्ठा प्रविष्टि को आपके कम्प्यूटर के कचरा पेटी में शर्तिया फेंक आतीं. यानी, भले ही आप न हों, मगर लोगों को कूल और कॉम दिखाई देते रहने के लिए ऑफलाइनजीवी बने रहना फ़ायदेमंद होता है.
#3 आप ऑनलाइन रहते हैं तो आपका कम्यूटर आपको अति व्यस्त कर देता है. हर दस मिनट में आपके ईमेल का पॉपअप सूचित करता है कि आपके आवक-बक्से में एक ईमेल गिरा है. आप उसे देखने को लालायित होते हैं कि किस दोस्त का है, और यदि आप चिट्ठा लेखक हैं तो पढ़ने को लालायित होते हैं कि किस पाठक की प्रशंसा या मलामत युक्त टिप्पणी है. फिर आपकी उंगलियां खुद ब खुद प्रत्युत्तर देने को उठ आती हैं. और यह अंतहीन सिलसिला चलता रहता है. बात यहीं तक नहीं है – आपके कम्प्यूटर के सैकड़ों प्रोग्राम भी ऑनलाइन होते हैं तब और कभी आपका एंटीवायरस प्रोग्राम दन्न से आपके ऊपर पॉपअप फेंक कर यह सूचित करता है कि या तो उसने स्वयंमेव अपना वायरस डाटाबेस अद्यतन कर लिया है या इस हेतु वो आपकी आज्ञा चाहता है. आप कोई बढ़िया चिट्ठा पोस्ट आइडिया सोच रहे होते हैं और आपकी सोच में इस तरह के अप्रत्याशित व्यवधान आते रहते हैं- क्योंकि एंटीवायरस प्रोग्राम के बाद विंडोज अद्यतन का नंबर आता है या फिर किसी अन्य प्रोग्राम जैसे कि फ़ॉयरफ़ॉक्स एक्सटेंशन के नए संस्करण की संस्थापना का... यानी कि यदि आप सचमुच का कुछ विचार शील काम करने को सोचना चाहते हैं तो ऑफलाइन बने रहने में ही भलाई है.
#4 जब आप ऑन लाइन होते हैं तब या तो एडसेंस खाते या फिर नारद – ब्लॉगवाणी – चिट्ठाजगत के पृष्ठों को रीफ्रेश करते रहते हैं – यह देखने के लिए कि इस घंटे कितनी कमाई हो गई या किस चिट्ठाकार ने ताज़ा ताज़ा, अभी अभी नए ढंग से नारद को कोसा है. आपके पेज रीफ्रेश यहीं तक सीमित नहीं होते. आपकी रुचि के अनुसार ये दर्जनों की संख्या में, जैसे कि स्लैशडॉट भी हो सकते हैं और डिग भी. और आपके इन पेज रीफ्रेशों से न तो आपकी कमाई बढ़ती है न पोस्टों की संख्या.
#5 जब आप ऑनलाइन होते हैं तो आपका माउस आलतू फ़ालतू जगह पर क्लिक होने को मचलता है. किसी आख्यान में यदि दस कड़ियाँ होंगी तो शर्तिया आपका माउस क्लिक पंद्रह बीस कड़ियों पर क्लिक होगा – क्योंकि उन कड़ियों पर जाने के बाद आपको और अन्य महत्वपूर्ण, अनदेखा नहीं की जा सकने वाली कड़ियाँ दिखाई दे जाती हैं. इस तरह आपके छोटे से दिमाग में तमाम तरह की जंक सामग्री भरते जाती है. जब आप ऑफलाइन होते हैं तो यह संभावना नगण्य होती है. और फिर यदि कोई कड़ी महत्वपूर्ण लगती है तो उसे आप नोट कर रखते हैं – अगले ऑनलाइन स्थिति में जाकर देखने के लिए – तब तक आप या तो वह महत्वपूर्ण नहीं रह जाता या फिर आप उस अमहत्वपूर्ण कड़ी को भूल चुके होते हैं. अपने दिमाग को साफ सुथरा रखने के लिए ऑफलाइन स्थिति एक बेहतर विकल्प है.
#6 आपके जेब के लिए ऑफलाइन स्थिति स्वास्थ्यकारी है. जब आप ऑनलाइन होते हैं तो किसी चिट्ठापोस्ट की यूट्यूब की कड़ी आपको वो वाला वीडियो देखने को ललचाती है. आप वो वीडियो, चलो जरूरी मानकर देख लेते हैं – मगर फिर आगे शातिर यूट्यूब आपके सामने संदर्भित वीडियो की कड़ियों की भरमार कर देता है – आप उनमें से कोई दो-चार या तो देख मारते हैं या फिर बाद में देखने के लिए बुकमार्क कर ही लेते हैं. यही हाल एमपी3 गानों, पॉडकास्ट और इंटरनेट रेडियो का भी है. तो, जब तक आप अनलिमिटेड खाते में नहीं हैं या आपके इंटरनेट खर्चे (यूट्यूब दर्शन पढ़ें) को कोई दूसरा नहीं भर रहा है – ऑफलाइन से बढ़िया विकल्प नहीं.
#7 ऑफलाइन स्थिति एक लेखक के तौर पर आपके दिमाग को, आपके लेखन को अनएडल्ट्रेटेड रखती है. यदि आप कुछ लिखना चाहते हैं तो आपको उस पर सोचना होता है, सोच समझ कर, आंकड़े एकत्र कर काम करना होता है. अन्यथा आप स्वचालित रूप से गूगल सर्च कर ही मारते हैं और जो अचरा-कचरा सामग्री उपलब्ध होती है उसे शाश्वत सत्य मानकर बहुतेरी सामग्री का इस्तेमाल कर लेते हैं.
#8 आपकी ऑफलाइन स्थिति आपके कम्प्यूटर के स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होता है. तब आप वायरस, ट्रोजन इत्यादि के भय से मुक्त होकर एंटीवायरस, फ़ॉयरवाल इत्यादि को असक्षम कर सकते हैं जिससे न सिर्फ आपका कम्प्यूटर उतना तेज चलेगा जितना कि उसे डिजाइन किया गया है, बल्कि वह बिजली भी कम खाएगा. आपके हार्डडिस्क का जीवन बढ़ेगा और यदि आप लॅपटॉप इस्तेमाल करते हैं तो आपकी बैटरी ज्यादा देर तक चलेगी और आपका लॅप जहाँ से कुछ नीचे आमतौर पर चिट्ठाकारों का दिमाग स्थित होता है, कुछ कम तपेगा.
#9 जब आप ऑफलाइन होते हैं तो समर्पित-से होते हैं. ऑफिस में काम के प्रति और घर में बीवी बच्चों (या माता पिता) के प्रति. आपके पास ढेर सारा फालतू समय होता है क्योंकि किसी ईमेल का तत्काल त्वरित जवाब नहीं देना होता, किसी चिट्ठापोस्ट में त्वरित टिप्पणी नहीं देनी होती. लिहाजा आपका कोड आमतौर पर बग फ्री बनता है जिसे आप ध्यानमग्न होकर लिख मारते होते हैं, या घर पर बीवी बच्चों (या माता पिता) की बातें वास्तव में सुन रहे होते हैं – बजाए सिर्फ हां हूं कर सिर हिलाने के और दिमाग किसी ऑनलाइन साइट में लगाने के.
#10 (नंबर 10 रिक्त है – आपके अनुभवों के लिए. हो सकता है आपके अनुभव मेरे से भिन्न हों और हो सकता है आप ऑनलाइन के फायदे गिनाएँ – तो देर किस बात की? लिख मारिए अपने-अपने अनुभव टिप्पणियों में. मुझे पता है आप इसे ऑनलाइन पढ़ रहे हैं. है कि नहीं? )
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