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Friday, August 3, 2007

प्यास

प्यासे ही रहेसाहिल की रेत की तरह ,
दिन जलाए कभीकिरणे लपेटकर,
कभी सो गएलहरे ओढ़ कर,
कितने कदमदिल से होकर गुजरे,
कितनी स्मृतियाँराहों में गुम गयीं,
कितने किनारेपानी में समा गए,
फिर भीप्यासे ही रहे।

जिन्दगी तो थी वहींजिसके सायों को हमनेडूबते
सूरज की आंखों मे देखा था,
उस बूढ़े पीपल की,
छाँव में ही, सुकून था कहीं,
उन नन्ही पगडंडियों से चलकर,
अब हम चौड़ी सड़कों पर आ गए,
हवाओं से भी तेज़,
हवाओं से भी परे,
भागते ही रहे,
फिर भी,प्यासे ही रहे।
एक नन्हीं-सी चिंगारीकहीं राख में दबी थी,
लपक कर उसनेकिरणों को छू लिया,
सूखे पत्तों को आग दी,
हवाओं में उड़ा दिया,
कहीं अपना था कुछजिसे खो दिया,
और मोल ले लिया,
एक चमकता हुआ "कतरा"डूबते रहे,
डूबते ही रहे,
फिर भी,
प्यासे ही रहे,
प्यासे ही रहे।

1 comment:

Anonymous said...

Good going , keep it up !!