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Tuesday, August 7, 2007

प्यास

प्यासे ही रहे

साहिल की रेत की तरह ,

दिन जलाए कभी

किरणे लपेटकर,

कभी सो गए

लहरे ओढ़ कर,

कितने कदम

दिल से होकर गुजरे,

कितनी स्मृतियाँ

राहों में गुम गयीं,

कितने किनारे

पानी में समा गए,

फिर भी

प्यासे ही रहे।


जिन्दगी तो थी वहीं

जिसके सायों को हमने

डूबते सूरज की आंखों मे देखा था,

उस बूढ़े पीपल की,

छाँव में ही, सुकून था कहीं,

उन नन्ही पगडंडियों से चलकर,

अब हम चौड़ी सड़कों पर आ गए,

हवाओं से भी तेज़,

हवाओं से भी परे,

भागते ही रहे,

फिर भी,

प्यासे ही रहे।


एक नन्हीं-सी चिंगारी

कहीं राख में दबी थी,

लपक कर उसने

किरणों को छू लिया,

सूखे पत्तों को आग दी,

हवाओं में उड़ा दिया,

कहीं अपना था कुछ

जिसे खो दिया,

और मोल ले लिया,

एक चमकता हुआ "कतरा"

डूबते रहे,

डूबते ही रहे,

फिर भी,

प्यासे ही रहे,

प्यासे ही रहे।

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जाने किस अनजान डगर से

पथिक बन तुम चले आए ..

चुपके से यूँ ही मेरी ज़िंदगी में

सुना मेरे दिल ने एक गीत नया

कोई

और अपने सारे प्यार से,

भर दी सारी तृष्णा तुम्हारे

प्यासे से मन की .. ..

जीवन हर पल बनता रहा

बादल कोई प्यार से उमड़ता हुआ

बरसाने को आतुर मेरा दिल

हर पल तलाशता रहा ..

तेरे दिल का हर कोना प्यासा-सा

लेकिन ...तुम आए और

फिर अचानक चल दिए अपनी

राह पर

मैं आज भी कर रही हूँ प्रतीक्षा

निर्जनता में सुनती शोर

अपने दिल की धड़कनों का

सोच रही हूँ उस प्यार के पलों

को

जिसके गहरे सागर में

अपना कुछ न बचा के

सब कुछ समर्पण कर दिया था

तुम्हें

अब तुम समझ के भी मेरे इन

गीतों को

कैसे समझ पाओगे

जिसे गा रही हूँ मैं तुम्हारे जाने

के बाद

एक अनबुझी प्यास जो दे गये

मेरे तपते मन को

वो बुझा रही हूँ अपने बहते


आँसुओ के साथ


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आँखों से ढलकर

सूखी जीभ पर अपना अस्तित्त्व

न्यौछावर करती

हलक़ से उतरकर

घूँट भर प्यास

सीने में

और

धीरे-धीरे

खून की हरेक नस में

समा जाती है ।

कभी - कभी यूँ भी

भर आती है प्यास बदन में

असरफ़ी कीअसरफ़ी जैसी आँखें

जिनमें, है चमक

सूरज की तपन की,

पेट में न जाने कब से

उबल रहे सूरज की

और सूरज जैसे कई

आग के गोलों की

जो कभी भी

फ़फ़क कर गिर सकते हैं

छाले से सजी हथेलियों पर ।

अँगूठा छाप ,

गँवारके ये हाथ ,

जो लिख नहीं सकते

एक अक्षर भी

कागज़ पर,

पर लिखते हैं

रोज़चेहरे पर

परिभाषा दो घूँट प्यास की ।

रोज़ तो पी जाता है वह

एक कतरा प्यास

खून की हर घूँट के साथ !

न प्यास बुझती ,

न आग ।

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है कौन यहाँ जिसे प्यास नहीं है,

जीने की किसे आस नहीं है...

प्यास जहाँ हो चाहत की,

ज़िन्दा दफ़नाए जाते हैं,

हर दिल में मुमताज की खातिर,

ताज़ बनाए जाते हैं...

वीरान है वो दिल जिसमें

मुमताज नहीं है

है कौन यहाँ जिसे प्यास नहीं है,

प्यास जहाँ हो पिया मिलन की

वहाँ स्वप्न संजोये जाते हैं

प्रियतम से मिलने की चाहत में

नैन बिछाये जाते हैं

प्यासे नैनों में आँसू की थाह नहीं है

है कौन यहाँ जिसे प्यास नही है

प्यास जहाँ हो बस जिस्म की

दामन पे दाग लगाये जाते हैं,

कुछ पल के सुख की खातिर

हर पल रुलाये जाते हैं

माटी के तन की बुझती प्यास नहीं है

है कौन यहाँ जिसे प्यास नहीं है

प्यास जहाँ हो दौलत की,

कत्ल खूब कराये जाते हैं,

अपने निज स्वार्थ की खातिर,

दिल निठारी बनाये जाते हैं...

खून बहा कर भी मिलती एक सांस नहीं है

है कौन यहाँ जिसे प्यास नही है,

प्यास जहाँ हो शोहरत की,

रिश्ते भुलाये जाते हैं,

एक नाम को पाने की खातिर,

हर नाम भुलाये जाते हैं

भाई से भाई लड़े रिश्तों में आँच नहीं है

है कौन यहाँ जिसे प्यास नहीं है

प्यास जहाँ हो वतन की,

वहाँ शीश नवाये जाते हैं,

धरती माँ के मान की खातिर,

सर कलम कराये जाते हैं

आज़ादी की रहती किसको आस नहीं है

है कौन यहाँ जिसे प्यास नहीं है

है कौन यहाँ जिसे प्यास नहीं है

जीने की किसे आस नहीं है॥


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तुम मधुशाला के प्रेमी हो,
तुम को प्यास से क्या लेना,
पत्थर दिल पत्थर भाव हैं फिर,
मन के अहसास से क्या लेना

गूँज रही है जहाँ ध्वनि,
मधु के प्यालों के चुम्बन की
और जहाँ पर लगी प्रदर्शनी,
नारी देह और यौवन की
कौन विवशता किन्तु समझता
उसके मन की और जीवन की

तुम खुद ही भीड में शामिल हो
उसके उपहास से क्या लेना...
पत्थर दिल पत्थर भाव हैं फिर,
मन के अहसास से क्या लेना

मर्यादा की चिता सजी,
तुमचल कर अग्नि प्रदान करो
चाहे मानवता भी लज्जित हो
तुम नैतिकता बलिदान करो
चाहे जितनी चीख-पुकार मचे
पर तुम केवल मद-पान करो

तुमको पीना सदा मुबारक
दुःख-सुख, परिहास से क्या लेना..
पत्थर दिल पत्थर भाव हैं फिर
,मन के अहसास से क्या लेना

चाहे मन को दुःख का भार मिले
चाहे खुशियाँ अपरम्पार मिले
होली या दीप दीवाली हो
चाहे कोई भी त्यौहार मिले

जीवन के कदम-कदम पर तुम
चाहे जीत मिले या हार मिले
संकोच बाँटने को कोई, साथी हो
चाहे न होमधुशाला,मधु, साकीबाला बस

तुमको बारम्बार मिलेजो
खुद को बाँध चुके तुमसे
उनके विश्वास से क्या लेना..
पत्थर दिल पत्थर भाव हैं फिर,

मन के अहसास से क्या लेना
"मन" के अहसास से क्या लेना

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