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Saturday, August 4, 2007

कविता- किनारा

कविता- किनारा

कैसी विडंबना है प्रकृति की

दो किनारे चाह कर भी

मिल नहीं पाते एक दूसरे से ।

मैं ज़िन्‍दगी के तेज़ धार को

सीमित करने की आकांक्षा लिए अड़ा हूं

मेरे सीने पर कटाव के जख़्म उभरते हैं

कट-फट जाते हैं मेरे गीत

और मैं होंठों को सीकर शून्‍य आसमान में

धार के उस पार कुछ खोजता हूं ।

मैं ही नहीं, कोई और भी है

जो इस संग्राम को, जख़्‍म को

दिल में छायाचित्र की तरह उतार रहा है

मेरे कटाव का जमाव उसके सीने पर है

अपने अस्तित्‍व को कायम रखने के लिए

निरंतर तूलिका में जुटे हाथ

सृजन की जीवन रेखा बनने का स्‍वप्‍न

सचमुच तुम और तुम्‍हारा

सब कुछ, आदर्श है ।

मैं सब कुछ सह सकता हूं

सीने का जख़्‍म, तेरे न मिलने का दुख

क्‍योंकि मैं ये जानता हूं कि ये मेरे साथी,

जटिल परंपराओं के शाश्‍वत धार समूह

तुम्‍हें मेरे पास रह कर भी मिलने नहीं देंगे ।

न किनारों से धार अलग हो सकते न धार से

किनारे
सब मिलकर हमें नदी कहलाना है
इसलिए सब कुछ सहना पडता है गुमसुम
होंठों को सिये हुए ।

हमने बसाये हैं संस्‍कृतियां अपनी थाती पर

अपने नाम को सार्थक किया है
किनारों को किनारे ही रहना चाहिए

किनारे से मिलने का स्‍वप्‍न

तो, बस एक स्‍वप्‍न है ।

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