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Saturday, August 4, 2007

तुम सिखा दो

तुम सिखा दो

दुख हो या कि सुख सदा

उत्सव मनाना, तुम सिखा दो..

दूसरों के मर्म पर

सब कुछ लुटाना, तुम सिखा दो..

मुस्कुराना तुम सिखा दो..

जानता हूँ, सैकड़ों बादल रखे हैं,

हँसती आँखों में छिपाकर

तृप्त हो लेती हो अपना मन,

अकेले में भिगाकरऔर कह देती हो मुझसे-

'सुख इसी अवसाद में है'!!आह!!

कैसा सुख कि अपना घर जलाकर,

नीड़ औरों का बसा खुद को मिटाना,

तुम सिखा दो..मुस्कुराना तुम सिखा दो..


मैं कहाँ रोया कि जब कोई बात गड़ती है


हृदय में कब बता पाया कि

तुम ही मार्गदर्शक हर विजय मेंऔर तुम...

आकाश के निर्लिप्त पंछी की तरह ही

मौन के विस्तार को भी,

बाँधती हो एक लय मेंआँसुओं की लय पिरोकर,

गुनगुनाना, तुम सिखा दो..मुस्कुराना तुम सिखा दो..

रात का अंतिम प्रहर है,

तुम निरंतर दिख रही हो मैं

तो केवल शब्द गढ़ता,

तुम ही मुझको लिख रही हो

चाहता हूँ, प्रेम-रूपी इस शिला के

मिटा डालूँ लेख सारे,मिलन कैसा??

हम किसी सूखी नदी के दो किनारे!!

तुम न इस सूखी नदी पर
रेत का सेतु बनाना सब भुला दो,

है उचित सब कुछ भुलाना

मुस्कुराना तुम सिखा दो...

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