Text selection Lock by Hindi Blog Tips

Flag counter

free counters

Saturday, August 4, 2007

नारी तेरी यही कहानी

नारी तेरी यही कहानीइक सुबह टहलने निकला मैअपने देश की सडको परप्राण वायु समेट रहा थाघूम रहा था खुद को ताजा करपंछियो की चहचाहट थीवायुदेव की सरसराहट थीसुर्य की हल्की आहट पडीसुन्दर आकाश के खुले पटल परफ़ूलो की मस्तानी खुशबु थीमनोरम द्रश्यों की चांदनी थीआकाश पर सिन्दूर सजा थाऔर मैसुन्दर कल्पित चित्र बना रहा थामदमस्त विचारो के कागज परतभी अचानक आवाज इक आयीदुर्गन्ध चारो और थी छायीचीख पुकार पडी सुनाईराख का एक ढेर पडा थाअन्दर घर के आंगन परमै उस आवाज को ढूंढ रहा थातुफ़ान राख के ढेर से उठा थाखुद को सवित्रि बता रहा थाकहानी अपनी लिख रहा थामेरे कानो के पर्दो परबयां उसका कुछ यूं हुआ थामै सवित्रिपरसो दुल्हन का जोडा पहना थानयी धरती का सपना मेरी आंखो मे खेला था संग पति का सुन्दर थालेकिन सपना मेरा दहेज की आंग मे झुलस गयाराख बन बिखर गयी मैदहेज के इस श्मशान परसैर का आनन्द खत्म हुआकिस्सा मन मेरा झकझोर गयामै कुछ और सोच ही पातातभी देखा मैने इक अबला कोरो रही थीतन अपना छिपा रही थीउसने सर रखा था अपने हाथो परमैने पूछा क्या हुआबोली, नारीत्व मेरा लुट गयामेरा है बलात्कार हुआसब कुछ मेरा खत्म हुआदोषी अब भी घूम रहे हैनरीत्व औरो का छीन रहे हैइतना कहकर झूल गयी वोमेरे समाज की फ़ांसी परआंखो से आंसू मेरे टपक पडाइधर उधर देख रहा था हुआ खडातभीइक बच्ची की आवाज आयीदर्द था इतना चारो और खामोशी छाईसामने मेरे भ्रूण पडा थाकुडे के इक ढेर परवो रो रही थी जीवनी अपनी सुना रही थीऔर कह रही थीमै अजन्मी,दुनिया मैने देखी न थीफ़िर मेरी गलती क्या हुईमां क्यों चुप रहीमेरी इस निर्मम हत्या परदेख नारी की एसी हालत मै आहत असहाय हुआपकड माथा वहीं पर मै बैठ गयाआंखो से मेरी निकल रहा था पानीमन कह रहा था नारी तेरी यही कहानीसमाज मेरा आधुनिक हुआ हैदहेज हवस पैसे का गुलाम बना हैधिक्कार है ऐसी आधुनिकता परइक सुबह टहलने निकला मैअपने देश की सडको पर

अभिलाषाजब से देखा है तुमकोबने हो मेरे जीवन की अभिलाषामेरे प्रेम प्रश्न का तुम अनुत्तरित उत्त्तर होप्रथ्वी के इस हरे पटल परमेरे जीवन की परिभाषाह्रदय मे मेरे उठती है लहरेबनने को तेरे मुख की भाषातुम आओगे जीवन मे मेरेलाओगे खुशबुविचार के मंथन मेहोती कुछ एसी आशाहोगी तुम्हारे प्रेम की वर्षातर्प्त होगा ये ह्रदय प्यासामिलन जब तेरा मेरा होगावातावरण वो मोक्ष सा होगाकरती है कल्पना मेरीकुछ एसी अभिलाशा


मौत,तू किसी रोज,एक सहर की तरह आना....मेरे जिस्म में अभी जब खून दौडता हो-साँसों के बह्कने का कोई अंदेशा ना हो-मेरे लबों परउसके इश्क का जाम हो-दिल में उसके ही प्यार का दर्द और आँखों मेंउसका ही तस्सवूर हो--मौत, तू किसी रोज,अलसायी सुबह सी आना!!उसके आँगन जब --नर्गिस खिलें,आशियाना जब जिंदगी से चहके...उस रोज,किसी रोज,मौत तू --चुपके से आनामौत तू किसी रोजनयी जिंदगी देने आना!!

मां का बटवाराधरती के ऊपर आसमां के नीचे लडकी इक बौरयी सी घूम रही हैसोच के अथाह सागर मे वो कमसिन डूबी हुई है अचानक कोई उसे छूता है सोच के अन्धे सागर से उसका बहर आगमन होता हैडर उसके चेहरे पर झलका हैसहमा हुआ उसका ह्रुदय सा लगता हैसमक्ष उसके सांत्वना का दीपएक प्रज्वलित होता हैस्थितियों पर उसकोविश्वास सा अब होता हैपरिचय उससे गया जब मांगा रुन्धे हुए कंठ से बोली नाम है मेरा भारत मातामेरे चार पुत्र रत्न थेजिनके कईं सुस्वपन थे मुझको खुशहाल वो देखना चाहते थे उनकी एकता के लोग किस्से गाते थे नाम था उनका हिन्दु मुस्लिम सिख ईसाई नही उन जैसे देखे थे भाईसब कुछ ठीक चल रहा थाखुशहाली का हर तरफ़ आलम थातभी अचानक सावन का मौसम हुअ खत्मअन्धकार का फ़िर हुआ आगमनबाहर से एक आदमी आया मेरी खुशहाली से जो जलता थाअपने कर्मो से इंसानियत को वो कलंकित करता थामेरे बेटो मे उसनेलडाई का बीज बो दिया थासब कुछ मेरा बसअब खत्म हो गाया थाशनैः शनैः वो बीज हुआ अंकुरितसामने मेरे शैतान हुआ अवतरितउसने मेरे बेटो को लडवाया था मैने अपना सब कुछ गंवाया थाफिर इस मां के भारत पाकिस्तानदो टुकडे हो गयेऔर इसी के साथ मेरे बेटे मुझसे अलग हो गयेउस लडकी की आंखेअभी भी किसी को ढूंढ रही हैलगता है अपने दूध का कर्ज मांग रही हैवो लडकी बौरयी सीफिर सोच के अथाह सागर मेखो जाती हैधरती के ऊपर आसमां के नीचे

No comments: