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Saturday, August 4, 2007

कैसे थाम लूँ हाथ तुम्हारा?

कैसे थाम लूँ हाथ तुम्हारा?


तुम मन चंचल बहता झरना

मैं शांत स्वभावी नदी किनारा

तुम राह गर्म, मैं राही हारा


कैसे थाम लूँ हाथ तुम्हारा?


तुम महका गुलाब धरे कंचन कायामैं

शुष्क बबूल, न फल न छाया

कंटीला कर दूँ पथ तुम्हारा?

कैसे थाम लूँ हाथ तुम्हारा?

तुम प्रेम-मधु छलकाता प्यालामैं जोगी,


प्रभू की जपता मालाव्यर्थ होगा,

मेरा तप सारा

कैसे थाम लूँ हाथ तुम्हारा?


तुम मुक्त गगन में पंछी उड़ता मैं शब्द-भाव में उलझा रहता

कहो ‘कवि’ ने किसको उबारा?

कैसे थाम लूँ हाथ तुम्हारा?

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